क्या भाग्य कर्म से ऊपर है ?
यह कविता एक साधारण व्यक्ति के आत्मसंघर्ष को दर्शाती है, जो हर दिन खुद को बदलने की शपथ लेता है, लेकिन बार-बार विफल हो जाता है। जब उसके प्रयत्न और संकल्प निष्फल होने लगते हैं, तब वह अपने इष्ट से यह प्रश्न पूछता है — क्या भाग्य कर्म से ऊपर है? यह कविता आत्मचिंतन, आस्था और प्रयास के बीच की कशमकश को शब्दों में पिरोती है।
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Poetry





